हमारे खान पान में शामिल कई तरह के अखाद्य पदार्थों और हानिकारक कैमिकल्स का अनचाहा मिश्रण बीमारियों को आमंत्रित करता है। आज केंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर समेत तमाम बीमारियां जिस तरह विकराल रूप ले चुकी हैं, वह इसी तरह के खान पान का नतीजा हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में असंभव को संभव बनाने का दावा करने वाला पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र इन बीमारियों के आगे घुटने टेकने लगा है। यही वजह है कि विकसित कहा जाने वाला पश्चिम अब जड़ी बूटी तथा आयुर्वेद की तरफ हसरत भरी निगाहों से देख रहा है। चमत्कारिक गुणों से भरपूर ‘बदरी बेरी’ ऐसी खतरनाक बीमारियों को जड़ से मिटाने की क्षमता रखता है।
जड़ी बूटी शोध केंद्र गोपेश्वर (मंडल) के वैज्ञानिकों की देखरेख में उच्च हिमालय में मौजूद औषधीय पौधा सी-बक-थार्न के पके फलों से बनने वाले अर्क को बदरी बेरी नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बदरी बेरी में केंसर, लीवर डिसआर्डर, ब्लडप्रेशर, डायविटीज जैसी बीमारियों के लिए हमारे शरीर में बनने वाले आधार को समूल नष्ट करने की क्षमता है। यह शरीर से बीमारी पैदा करने वाले टाक्सीन को बाहर करता है, जिससे शरीर के अंदर बीमारियों के लिए तैयार हो रहा प्लेटफार्म ध्वस्त हो जाता है। इसमें अत्यधिक एंटीआक्सीडेंट होने के कारण शरीर में पैदा होने वाले फ्री रेडिकल्स को समाप्त कर देता है। जिससे कैंसर जैसी बीमारी नहीं होती है।
बदरी बेरी को एक फूड सप्लिमेंट के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिसके अपने औषधीय गुण इस अर्क में मौजूद हैं। अर्क में बिटाइमिन ‘सी’,‘ई’ और ‘के’ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। साथ ही बदरी बेरी अर्क में फेनोलिक कंपाउंड, कारटानाइड्स, फाइबर और मिनरल की भी बेहतर मात्रा में मौजूदगी है। जड़ी बूटी शोध केंद्र गोपेश्वर के वैज्ञानिक डा विजय भट्ट के अनुसार बदरी बेरी फूड सप्लिमेंट का लैब टेस्ट किया जा रहा है तथा इसके नमूनों को अमेरिका भेजा गया है। अब इसके पेटेंट कराने की तैयारी चल रही है। डा.भटट के अनुसार सी-बक-थार्न जिसे उत्तराखंड की स्थानीय भाषा में अमेश और चूख कहा जाता है, नेशनल मेडिकल प्लांट बोर्ड के वित्तीय सहयोग से जड़ी बूटी शोध केंद्र गोपेश्वर द्वारा उच्च हिमालयी क्षेत्र के किसानों के जरिये इसकी खेती और कलेक्शन किया जा रहा है। किसानों के सहयोग से बने इस फूड सप्लिमेंट को बदरी बेरी नाम दिया गया है। भविष्य में इसके विकास से राज्य के कृषकों की आर्थिकी को मजबूती प्रदान की जा सकती है।
badri_deri इस औषधीय पादप की गुणवत्ता को देखते हुए 25-26 फरवरी 2016 में राजभवन में आयोजित हुए दो दिवसीय पुष्प प्रदर्शनी की थीम सी-बक-थार्न के नाम पर रखी गई थी और डाक विभाग ने इसी थीम पर डाक टिकट जारी किया था। तभी बदरी बेरी को बाजार में उतारा गया था। इस दौरान औषधियुक्त बदरी बेरी अर्क के गुणों से प्रदेश के राज्यपाल समेत तमाम अधिकारी तथा नेता वाकिफ हुए।
सी-बक-थार्न (हिपोफी सालिसिफोलिया) एलिगनेसी कुल का एक छोटा वृक्ष अथवा बड़ी झाड़ी के रूप में चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, देहरादून, बागेश्वर जनपदों के उच्च शिखरीय क्षेत्रों मंे उगता पाया जाता है। इसका पौधा मृदा क्षरण को रोकने में सहायक होता है। यह भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ाता है। यह भूमि की उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ाने में सहायक होता है। स्थानीय लोग इसे अमेश, अमलीच, चूक अथवा इमली के नाम से जानते हैं।द
बद्री बेरी का होगा व्यावसायिक उत्पादन, विदेशों में भारी मांग
गोपेश्वर स्थित जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान ने प्रदेश में बद्री बेरी के व्यावसायिक उत्पादन के लिए पहल की है।
उच्च औषधीय गुणों वाला यह पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाले ठंडे इलाके में पाया जाता है। इसके लिए हिमाचल के लाहौल स्फीति जिले से एक हजार पौधे मंगाए गए हैं। इनको एक सप्ताह के भीतर पिथौरागढ़ जिले के मुंश्यारी में रोपित किया जाएगा। विदेशों में इसकी ज्यादा मांग होने से प्रदेश के किसानों के लिए भी यह काफी लाभकारी साबित हो सकता है।
लाहौल स्फीति जिले के कुकुमश्री से इसकी पौध लाने गए जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वीपी भट्ट ने बताया कि बद्री बेरी (वैज्ञानिक नाम- हिपोथी सॉलीसिफोलिया) औषधीय गुणों से भरपूर होने के अलावा भूमि की सेहत के लिए भी बहुत उपयोगी है। इसकी पत्तियां व फलों का रस निकालकर सत बनाया जाता है।
इससे बने उत्पाद प्रबल कैंसररोधी होने के अलावा डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, लीवर, पाचन तंत्र आदि से जुड़े रोगों में बेहद कारगर होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड ने इस पर अधिक शोध करने के लिए उन्हें प्रोजेक्ट दिया है। छत्तीसगढ़ के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कालेज, रायपुर ने जांच के बाद उत्तराखंड की बद्री बेरी को उच्च गुणवत्ता वाली घोषित किया है।
डॉ. भट्ट ने बताया कि दाल परिवार का न होने को बावजूद यह जमीन में नाइट्रोजन को बढ़ाता है। इसकी जड़ों में ऐसे तत्व होते हैं, जिनसे बेकार भूमि भी उर्वर बन जाती है। इसके अलावा यह भूमि का क्षरण रोकने में भी काफी मददगार साबित होता है। इसे अमेष, चूक, आमलीच आदि नामों से भी जाना जाता हैं।
उन्होंने बताया कि इसकी खेती के लिए ऊंचाई पर स्थित ज्यादा ठंडे इलाके उपयुक्त हैं, इसलिए प्रदेश के ऐसे इलाकों के किसानों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है। क्योंकि इसके औषधीय गुणों के कारण अब विदेशों में भी मांग बढ़ी है। मुंश्यारी में एक हजार पौधे लगाकर इनसे कलम विकसित कर प्रदेश के उपयुक्त इलाकों के इन्हें रोपित किया जाएगा।
जांच के दौरान पाया गया है कि बद्री बेरी विभिन्न रोगों खासतौर पर कैंसर, डायबिटीज आदि में बेहद कारगर है। प्रोजेक्ट के तहत हमारे संस्थान में इस पर कार्य जारी है। हिमाचल से एक हजार पौधे मंगाकर लगाए जा रहे हैं। इससे ऊंचाई पर बसे किसानों को आमदनी का बेहतर जरिया मिल सकेगा।
– डॉ. वीएस नेगी, निदेशक, जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान


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